30 दिसंबर 2015 यौम ए विसाल हुज़ूर मुजाहिद ए अहले सुन्नत मुंगेरी
हुज़ूर मुजाहिद-ए-अहल-ए-सुन्नत, हज़रत अल्लामा मौलाना अल-हज अश-शाह अब्दुल अहद सिद्दीकी नूरी मुंगेरी (رضي الله تعالى عنه),
सुन्नी हनफ़ी बरेलवी मसलक के बड़े धर्म गुरु हुज़ूर मुजाहिद ए अहले सुन्नत हज़रत अल्लामा मौलाना अल्हाज अश’शाह अब्दुल अहद सिद्दीकी नूरी मुंगेरी रज़िअल्लाहु तआला अन्हु कि पैदाइश (जन्म) 25 मई सन् 1927 (23 ज़ुल-का़दा 1345 हिजरी) को मुहल्ला शुतुर खाना बेनिगिर जिला मुंगेर शरीफ बिहार में एक दीन दार घराने में हुई , आपके खानदान का ताल्लुक इस्लाम के पहले ख़लीफा हज़रत अबू बकर सिद्दीक रज़िअल्लाहु तआला अन्हु से मिलता है , इस लिहाज़ से आप आले सिद्दीक ए अकबर भी हुए , आपकी पैदाइश के वक्त आपका नाम मुहम्मद रखा गया फिर बाद में आपके दादा जान ने आपको अब्दुल अहद सिद्दीकी कह कर पुकारा और आप इसी नाम से मशहूर भी हुए,
आप जब 4 साल 4 माह 4 दिन के हुए तब आपकी बिस्मिल्लाह ख़्वानी आपके दादा हुज़ूर मौलाना ममुनत हुसैन सिद्दीकी ने कि और आपकी शुरुआती तालीम में आपके उस्ताद आपके दादा जान मौलाना ममुनत हुसैन सिद्दीकी और आपके बेहनोई मौलाना रियासत अली ख़ान रज़िअल्लाहु अन्हुम ने करवाई।
सन् 1942 में जब 15 साल के हुए आप ने आला तालीम के लिए बरेली शरीफ दारुल उलूम मंज़रे इस्लाम में दाख़िला लिया और आप काफी साल वही तालीम हासिल करते रहे, हुज़ूर मुजाहिद ए अहले सुन्नत के असातिज़ा कि फैहरिस्ट काफी तवील है, आपके वो उस्तादे गिरामी जिनसे आपने दर्से निज़ामी कि तालीम हासिल कि कुछ के नाम ये है हुज़ूर सदरुश्शरिया मुफ्ती अमजद अली आज़मी , हुज़ूर मुफ्ती ए आज़म हिन्द मौलाना मुस्तफा रज़ा खान, हुज़ूर मुहद्दिस ए पाकिस्तान अल्लामा सरदार अहमद कादरी, हुज़ूर मुहद्दिस ए फैज़पुरी मुफ्ती अहसान अली रज़वी रज़िअल्लाहु तआला अन्हुम अजमा ईन , इन बड़े बड़े अकाबिरीन से आपने आला तालीम हासिल की , और दौराने तालिबे इल्मी में शहजा़दा व जानशीने आला हज़रत हमशबी ए गौ़स ए आज़म हुज़ूर मुफ्ती ए आज़म हिन्द मौलाना मुस्तफा रजा़ खा़न बरेलवी से आपको बैत होने का शर्फ हासिल हुआ और आपको सन् 1950 में क़लमी इजाज़त ओ ख़िलाफत और तमाम चीजें खा़स ओराद ओ वज़ाइफ से भी नवाज़ा और आपके दर्सी साथी हज़रत मुफ्ती अहमद जहांगीर (उदयपुर) को भी साथ क़लमी ख़िलाफत अता फरमाई इनके अलावा आपको कु़तुब ए आलम हज़रत अल्लामा हाजी हिकमतुल्लाह शाह नक्शबंदी मुजद्दिदी तवक्कली करीमी अमरोहवी ने भी अपनी ख़ास इजाज़त ओ ख़िलाफत से नवाजा़ था
आपकी दसतारे फज़िलत सन् 1952 में दारुल उलूम शाहे आलम अहमदाबाद गुजरात में आले रसूल और उल्मा ए किराम के मौजुदगी में हुई, आपकी शादी सन् 1954 में शेख़पुरा बिहार के मालदार घराने की शहजा़दी नूरजहाँ बेग़म के साथ हुई आपके 5 शहजा़दे और 5 शहजा़दी हुई,
शादी के बाद सन् 1954 में ही आप बरेली शरीफ वापिस लौट आए और हुज़ूर मुफ्ती ए आज़म हिन्द कि सरपरस्ती में दारुल उलूम मज़हर ए इस्लाम में आपने दर्स देना शुरू किया और तक़रीबन 5 साल तक आपने दर्स दिया, इस दौरान आप मस्जिद बीबी जी में इमामत भी फरमाते और हुज़ूर मुफ्ती ए आज़म हिन्द भी आपके पीछे नमाज़ अदा फरमाते थे, धीरे धीरे आपका अक्सर वक्त अपने मुर्शीद ए इजाज़त के साथ गुज़रता और आप हुजरा ए खा़स में अक्सर ख़िदमत (सेवा) में होते और आप आपने मुर्शीद ए इजाज़त के साथ कसरत से सफर फरमाने लगे,
आप हमेशा फना फिश’शेख़ ज़िक्र ओ वज़ाइफ मे मशग़ूल रहते और हमेशा अपने मुर्शीद कि बाते बयान फरमाते और सीरात ए मुस्तकी़म का दर्स देते और हमेशा हक़ बयानी फरमाते थे यही चीज़ देख कर आपसे बड़े बड़े अकाबिरीन मोहब्बत फरमाते जैसे , हुज़ूर बुरहान ए मिल्लत , हुज़ूर हसनैन रजा़ खान , हुज़ूर मुहद्दिसे आज़म हिन्द , हुज़ूर मुफस्सिरे आज़म हिन्द उर्फ जिलानी मिया , सरकारे सुरकाहिं दादा तेग़ अली शाह , सरकारे कालां सैय्यद मुख़्तार अशरफ़ , कु़तुब ए आलम अल्लामा हाजी हिकमतुल्लाह शाह नक्शबंदी रज़िअल्लाहु अन्हुम अजमाईन जैसी शख़्सियत का नाम शमील है ,
हुज़ूर मुफस्सिरे आज़म हिन्द मौलाना इब्राहिम रजा़ खा़न उर्फ जिलानी मियां कि आप से इतनी मोहब्बत और गेहरी दोस्ती थी कि आप अक्सर उनके घर आते जाते और उनके बेटे हुज़ूर ताजुश्शरीया मुफ्ती अख़्तर रजा़ खा़न को भी अपनी गोदी में खिलाया करते और अक्सर उंगली पकड़ कर आप चलना सिखाते हुज़ूर ताजुश्शरीया भी आप से मानूस थे , इसी वजह से सरकार जिलानी मियां और मुफ्ती ए आज़म हिन्द कि भी आपको खास कुर्बत हासिल थी।
सन् 1960 में हुज़ूर मुफ्ती ए आज़म हिन्द के हुक्म से आप मुंगेर शरीफ बिहार तशरीफ़ ले गए और वहाँ आपने दीन ओ सुन्नियत कि ख़िदमत भी खु़ब अंजाम दी आपने तकरीबन 30 साल मस्जिद शम्सुद्दीन मुर्गिया चक मुंगेर शरीफ में इमामत और दर्स का काम अंजाम दिया, आप वहीं से बैठ कर हर मज़हब और धर्म के लोगो की परेशनियां सुनते और मसाइल हल फरमाते थे और आपकी बड़ी करामत ये रही के लोग एक ही बार में आपकी दुआ से अल्लाह तआला के हुक्म से शिफ़ायाब हो जाते और ख़राब मसाइल हल होते नज़र आते आपका इख़लास सिर्फ दिन ओ सुन्नियत के लिए वक्फ़ था इसी लिए आप ने कभी अपनी शोहरत व नाम नामी की फिक्र किए बगै़र गुमनामी से ज़िन्दगी बसर फरमाई , मगर अल्लाह तआला को कुछ और ही मंज़ूर था , उसने अपने इस नेक बन्दे कि मुहब्बत हजा़रों दिलों में डाल दी इसी लिए एक जम्मे ग़फीर आप से फैज़ हासिल करने के लिए ख़िदमत में मोजूद रहता , हुज़ूर बुरहान ए मिल्लत , हुज़ूर मुजाहिद ए मिल्लत , हुज़ूर अल्लामा अरशदुल कादरी, हुज़ूर सैयद मुज़फ्फर हुसैन किछोछवी, अल्लामा मुशातक अहमद निज़ामी, हुज़ूर सैय्यदुल औलामा, हुज़ूर अहसानुल औलामा,
मुफ्ती शाहजहाँ भागलपुरी, अल्लामा ग़ुलाम जिलानी मेरठी, मुफ्ती अहमद जहांगीर, हुज़ूर शेरे बिहार, हुज़ूर तहसीन ए मिल्लत, हुज़ूर ताजुश्शरीया, हुज़ूर अमीन ए शरीयत रज़िअल्लाहु अन्हुम अजमा ईन इन सभी के साथ आप जलसे फरमाते थे ,
आपको बहुत से अलका़ब (टाइटल) मिले जिन में से खास
हुज़ूर मुजाहिद ए अहले सुन्नत और असद उल उलमा हैं ये अलका़ब (टाइटल) आपको हुज़ूर का़ईद ए अहले सुन्नत अल्लामा अरशदुल क़ादरी, आले रसूल सैय्यद मुज़फ़्फ़ार हुसैन किछोछवी और हुज़ूर पासबने मिल्लत अल्लामा मुश्ताक अहमद निज़ामी रज़िअल्लाहु अन्हुम अजमा ईन ने उल्मा ए किराम की मौजुदगी में सन् 1980 में आपको नवाज़ा था।
आप ने अपनी जिंदगी में कुल 2 हज फरमाये, और मुंगेर शरीफ बिहार में एक बहुत बड़ा जलसा पैग़ाम हक़ कॉन्फ्रेंस भी करवाया जिसमे मुल्क के हर जगह से बड़े बड़े उल्मा ए किराम व सादात ए किराम कि आमद हुई थी, आपने अपनी ज़िन्दगी में अपने लिए माल ओ दौलत कभी जमा नहीं किया , बाकी आपकी तमाम उमर ख़िदमत ए ख़ल्क में गुज़री,
आप बचपन से ही तक़्वा शि’यारी के हामिल थे, अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने आपको बहुत सी खु़बियों से नवाज़ा था , जेसे ज़ोहद ओ तक़्वा इल्म ओ बुर्दबारी जैसी नुमाया खुबियां आपके अन्दर पाई जाती थी। आप ने अहले सुन्नत वल जमात यानी मसलक ए आला हज़रत पर सख़्ती से अपनी ज़िन्दगी गुजा़री और पूरी ज़िन्दगी उसपे का़यम रहे और अवामुन्नास को भी यही ताकीद फरमाते थे ,
आपके मुल्क ए हिंदुस्तान में काफी तादाद (संख्या) में मुरीद वा अकी़दतमंद मोजुद हैं और 8 बड़े औलामा को इजाज़त ओ ख़िलाफत से भी नवाजा़ जिनके नाम ये हैं,
- हुज़ूर सुल्तान उल-मुजाहिदीन अल्लामा ज़हूर रब्बानी सिद्दीकी नूरी साहब क़िबला (मुंगर शरीफ़ , बिहार )
- हुज़ूर सिराज उल ओलिया हज़रत शब्बीर अहमद कादरी चिश्ती रजि. (अहमदाबाद, गुजरात)
- हज़रत मौलाना अय्यूबुल कादरी रजि. (सुल्तानपुर, यू.पी)
- मौलाना इमाम अली रज़वी साहब क़िब्ला (धनबाद, झारखंड)
- मौलाना याकू़ब नूरी साहब क़िब्ला (होज़रानी, दिल्ली)
- मौलाना आसिफ रज़ा रज़वी साहब क़िब्ला (जोया यू.पी)
- मौलाना ज़हीर अहमद कादरी साहब क़िब्ला (दिल्ली)
- मौलाना इब्राहिम रज़ा नूरी साहब क़िब्ला (लोनी , गाजियाबाद)
आप नमाज़ ए फजर के बाद मुरीदो , अकीदतमंदो के साथ में बैठे थे और मरीज़ों का भी आना जाना लगा हुआ था आप उनके मसाइल और पारेशनिया सुनते और उनके हक़ में दुआ फरमाते और फिर कुछ देर के बाद आपके सीने में अचानक दर्द उठा और फिर सुबह 08:30 बजे आप विसाल ए हक़ फरमा जाते हैं और दुनिया ए फानी को अलविदा कर जाते हैं, हुज़ूर मुजाहिद ए अहले सुन्नत का इस तरह दुनिया से जाना एक अज़ीम ख़सारा है आलिम की मौत तमाम आलम की मौत है , आपका विसाल 30 दिसंबर सन् 2015 (18 रबीउल अव्वल शरीफ 1347 हिजरी) को हुआ था , आपका मजा़र ए पाक आपके अपने घर शुतुर खाना बीनेगीर मुंगेर शरीफ बिहार में जियारात ए ख़ास ओ आम है, आपकी नमाज़े जनाज़ा आपके शहज़ादा व जानशीने हुज़ूर मुजाहिद ए अहले सुन्नत , हुज़ूर सुल्तान उल-मुजाहिदीन उल-मुजाहिदीन हज़रत अल्लामा मौलाना अश’शाह मुहम्मद ज़हूर रब्बानी सिद्दीकी नूरी मद्दाज़िल्लहुल आली वल नूरानी ने अदा कराई थी जिस में बेशुमार ख़ल्क ए खु़दा का हुजूम था ,
आपके विसाल के बाद , आपके शहजा़दा व जानशीन हुज़ूर सुल्तान उल-मुजाहिदीन हज़रत अल्लामा मौलाना मुहम्मद ज़हूर रब्बानी सिद्दीकी नूरी ने मसनद ए तरीक़त पर जलवागर हुए और दीनो सुन्नित ख़िदते ख़ल्क़ ख़ुदा के तमाम फराइज़ , वालिद ए मजीद हुज़ूर मुजाहिद ए अहले सुन्नत के नक़्शे क़दम पर चलते हुए बख़ूबी अंजाम दिया और आज भी तमाम तिश्नगाने तरीक़त व राहे सुलूक को मुस्तफिज़ फरमाते हैं ,
हुज़ूर मुज़ाहिद ए अहले सुन्नत मुंगेरी का सालाना उर्स ए पाक क़मरी तारीख (उर्दू माह) के मुताबिक़ 18 रबीउल अव्वल शरीफ और (शम्सी) अंग्रेजी तारीख के मुताबिक़ 30 दिसंबर को खानकाहे रब्बानिया खुशहाल पार्क लोनी गाजियाबाद में बड़ी शानो शौकत से मनाया जाता है , यह कार्यक्रम तंजीम फैज़ाने रब्बानी वेलफेयर ट्रस्ट (रजिस्टर) कि जानिब से हर साल अंज़ाम दिया जाता है। यह तंजीम (ट्रस्ट) 17 जुलाई 2023 में रजिस्टर करवाई गई ताकि और मजबूती से अहले सुन्नत वल जमाअ़त यानी मसलके आला हज़रत कि इशाअ़त , खिदमत हल्क ख़िदमत ए ख़ल्क , तामीर , शिक्षा , ग़रीब , ज़रूरतमंदों , बेवाओं कि मदद और समाजसेवी जैसे कार्य के लिए बनाई गई है जो अपने मक़सद ए अज़ीम कि तरफ रवां दवां है, मालिकों मौला इस तंजी़म के मक़ासिद को पाए तकमील पर पहुंचाए और इस के अराकीन को हमेशा सलामत रखे और आपका पैग़ाम हमेशा , शरीअत ख़िदमत ए ख़ल्क , अहसन हुस्ने सुलुक आपस में भाई चारा प्यार ओ मुहब्बत होता , यही वजह थी के मुसलमानो के साथ-साथ दुसरे मज़हब के लोग भी आप कि मजलिस में हाज़िर होते और फैज़ पाते, हमें चाहिए कि ऐसे अज़ीम बुजु़र्गाने दीन वा अकाबिरीन ए अहले सुन्नत के नक्शे क़दम पे चलें ताकी दोनो जहाँ में हम सब को कामयाबी ओ कामरानी हासिल हो साके और बुजु़र्गाने दीन के फैजा़न से मालामाल हो साके।
“आमीन या रब्बुल आलमीन”